Biography of Swami Dayanand Saraswati in Hindi । स्वामी दयानंद सरस्वती की दिलचस्प जीवनी

By | July 14, 2018

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Biography of Swami Dayanand Saraswati in Hindi । स्वामी दयानंद सरस्वती की दिलचस्प जीवनी

इस लेख में हम जानेंगे “Biography of Swami Dayanand Saraswati in Hindi” क्योंकि स्वामी दयानंद का भारतीय राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और दार्शनिक चिंतन को अपूर्व योगदान है। वे भारतीय राष्ट्रवाद के आध्यात्मिक देवदूत थे। उन्होंने भारतीय समाज में क्रांति उत्पन्न की। वह सिर्फ एक सन्यासी ही नहीं थे, बल्कि एक बहुत ही महान राष्ट्रभक्त, धर्म संस्थापक, समाज सुधारक, वेदों के अप्रतिम भाष्यकार, तर्कशास्त्री और एक बहुत ही महान योगी थे।

Biography of Swami Dayanand Saraswati in Hindi । स्वामी दयानंद सरस्वती की दिलचस्प जीवनी

भारत के वर्तमान पुनर्जागरण आंदोलन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने अभूतपूर्व जीवनदायिनी शक्ति का कार्य किया। वह एक जन्मजात विद्रोही थे और वह अन्याय के विरुद्ध जीवन भर संघर्ष करते रहे। उनका मानना था कि “ मैं संसार को अज्ञान और अंधविश्वास से मुक्त करने आया हूँ।”

आर्य समाज की स्थापना

स्वामी ने भारतीय राजनीतिक स्वतंत्रता की बुनियाद तैयार की थी। उन्होंने ने 1874 में एक महान आर्य सुधारक संगठन – आर्य समाज की स्थापना की। उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज देश को अनेक स्वातंत्र्य योद्धा प्रदान किए और आर्य समाज ने ही देश में देशभक्ति की भावनाओं को फैलाया कथा अन्याय के प्रतिकार और स्वतंत्रता के संदेश को घर-घर तक पहुंचाया।

जन्म और परिवार

स्वामी दयानंद का जन्म सन् 12 फरवरी 1824 गुजरात के काठियावाड़ के मोर्वी नामक नगर में हुआ था। स्वामी दयानंद के बचपन का नाम मूलशंकर था। वह सामवेदी ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। स्वामी दयानंद ने शुक्ल यजुर्वेद, पूर्व मीमांसा तथा कर्मकांड से संबंधित अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया था। स्वामी दयानंद सरस्वती के मन में बचपन से ही मूर्ति पूजा और धार्मिक धर्म कांड के प्रति अविश्वास उत्पन्न हो गया था।

ज्ञान और अमरता की खोज

स्वामी जी वैवाहिक जीवन से बचने के लिए 21 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़कर भाग गया था और सन् 1845 से लेकर के सन् 1860 तक पूरे 15 वर्ष ज्ञान और अमरता की खोज में अलग-अलग स्थानों पर घूमते रहे। इन्होंने इस दौरान परमानंद परमहंस से वेदांतसार तथा वेदांत परिभाषा का ज्ञान प्राप्त किया। सन् 1860 ई. में स्वामी मथुरा पहुंचे मथुरा में पहुंच कर उन्होंने स्वामी विश्वानंद सरस्वती के चरणों में बैठकर पाणिनी तथा पतंजलि का अध्यन शुरू किया। वह रह करके उन्होंने करीब ढ़ाई वर्ष तक अध्ययन किया।

धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांड

सन् 1864 ई. से स्वामी दयानंद ने सार्वजनिक रूप से उपदेश देना आरंभ कर दिया और उनके व्यक्तित्व तथा वाणी से अनेक लोग प्रभावित और आकर्षित होने लगे। स्वामी धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांड पर तीव्र प्रहार करने लगे थे और उन्होंने घोषणा की कि इनका उद्देश्य मन, वचन और कर्म से सत्य का अनुसरण करना है। स्वामी दयानंद जी मूल रूप से आधुनिक भारत के एक महान् सामाजिक, समाज-सुधारक, देशभक्त, धार्मिक और दार्शनिक अदभुत चिंतक थे।

Biography of Swami Dayanand Saraswati in Hindi । स्वामी दयानंद सरस्वती की दिलचस्प जीवनी

आर्य समाज की स्थापना

17 नवंबर सन् 1869 को स्वामी दयानंद ने बनारस में हिंदू देव शास्त्र और परंपरावाद के नेताओं से शास्त्रार्थ किया। स्वामी सरस्वती में 10 अप्रैल सन् 1875 ई. को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की और सन् 1877 ई. में लाहौर में आर्य समाज के संविधान को अंतिम रूप दिया। इसके बाद स्वामी देश के विभिन्न भागों में घूमकर आर्य समाज का प्रचार करने में जुट गए। उन्होंने देशी रियासतों को अपना मुख्य कार्य क्षेत्र बनाया। इन रियासतों के शासकों ने स्वामी दयानंद का बहुत ज्यादा सम्मान किया और यहां तक की कई देशी रियासतों के राजे महाराजे स्वामी के शिष्य बन गए। उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह, शाहपुरा के राव नाहर सिंह और जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह स्वामी जी का बहुत आदर सम्मान करते थे।

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स्वामी वेदों के प्रकांड पंडित तथा उच्च कोटि के तर्कशास्त्री तो थे ही इसके अलावा उन्होंने धार्मिक अंतः करण के क्षेत्र में अपने शैव पिता के सत्तामूलक परंपरावादी आदेशों के समक्ष समर्पण करने से इंकार कर दिया और यही नहीं इन्होने हिंदू परंपरावादी नेताओं के प्रलोभनों तथा उनकी नाराजगी के सम्मुख समर्पण किया। वह ईसाई मजहब की बुराइयों की निरंतर निंदा करके लोगों को आगाह करते रहते थे। हालांकि कुछ समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने विजयोत्कर्ष के शिखर पर था। स्वामी जी परमार्थ सत्य की खोज में व्यक्ति को सर्वोच्च तथा पवित्र मानते थे।

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स्वामी दयानंद में अपार भक्ति तथा अपूर्व शारीरिक बल था। वह वेदों, वेदांग धर्मशास्त्रों के पूर्ण ज्ञानी थे। स्वामी संस्कृत और हिंदी भाषा के ज्ञाता और प्रकांड पंडित थे। स्वामी जी की वाक्पटुता बहुत ही मोहक तथा तर्कशक्ति अलौकिक थी। सत्यार्थ प्रकाश, वेदांतिध्वांति निवारण, पंचमहायज्ञ विधि, संस्कार विधि तथा ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका शादी स्वामी दयानंद जी की प्रमुख रचनाएं हैं।

भारतवासियों में स्वाभिमान की भावना जागृत की

स्वामी दयानंद ने भारतवासियों में स्वाभिमान की भावना जागृत की। मानसिक चेतना को चेताया और उन्हें अपने गौरवशाली अतीत के बारे में याद दिलाया। स्वामी जी ने पूरे देश के लिए एक संपर्क भाषा के होने की आवश्यकता को अनुभव कर लिया था। उन्होंने भारत की प्रादेशिक भाषाओं के लिए समान विधि की कल्पना करके दूरदर्शिता का परिचय दिया था। स्वामी जी की सपष्ट घोषणा थी कि जिस देश में एक भाषा, एक धर्म और एक वेशभूषा को नहीं अपनाया जाएगा तो उसकी एकता संदिग्ध बनी रहेगी। राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन देने के लिए स्वामी जी ने स्वदेशी का समर्थन किया और कहा कि स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना प्रत्येक भारतीय का धर्म है।

समाज सुधारक तथा अन्य कार्यक्रम

स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज सिर्फ धार्मिक आंदोलन न होकर के समाजिक तथा राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आंदोलन था। आर्य समाज में स्वदेशी प्रचार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली लागू करने, स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने और एक समाज सुधारक कार्यक्रम, दलितों का उद्धार करना, अस्पृश्यता निवारण तथा जाति प्रथा निषेध आदि कार्यक्रम चलाए भारतीय राष्ट्रवाद को पुष्ट और सचेष्ट करने की दिशा में सबसे आगे थे।

अनुसूचित व जनजातियों को ऊंचा उठाने के लिए

स्वामी दयानंद सामाजिक जागृति तथा समाज सुधार को राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए अनिवार्य मानते थे। स्वामी जी ने भारत की अनुसूचित व जनजातियों को ऊंचा उठाने के लिए तथा छुआछूत को देश से खत्म करने के लिए अनेक प्रयास किए। स्वामी जी ने यह क्रांतिकारी विचार समाज के समक्ष रखें कि दलितों को भी वेद पढ़ने का उतना ही अधिकार है जितना के उच्च जाति के लोगों को है। स्वामी जी ने दलितों को वैदिक संस्कार युक्त बनाने तथा उनको हिंदू समाज में सम्मान योग्य स्थान दिलाने का लगातार प्रयास किया।

मूर्ति पूजा वेद और धर्म के विरुद्ध

स्वामी दयानंद ने मूर्ति पूजा की भर्त्सना की और बार-बार घोषणा की कि मूर्ति पूजा वेद और धर्म के विरुद्ध है। उन्होंने मूर्तिपूजा के समर्थकों को कई बार शास्त्रार्थ में बुरी तरह पराजित किया। वे धार्मिक स्थानों को अनाचार का अड्डा और पंडे – पुजारियों को स्वार्थ – भावना का प्रतीक मानते थे।

नारी की महत्ता को स्थापित किया

स्वामी जी ने हिंदू समाज में नारी की महत्ता को स्थापित किया और उन्होंने इस बात पर हमेशा बल दिया कि औरतें पुरुषों के समान हैं। पत्नी अपने पति की दासी न होकर के अर्धांगिनी है। औरतों के लिए वेदों के अध्ययन के अधिकार का प्रतिपादन किया और औरतों पर लगें अनेक सामाजिक बंधनों का घोर विरोध किया। सचमुच स्वामी दयानंद जी ने भारतीय समाज की औरतों की गौरव गरिमा को पुनर्स्थापित किया और मनुस्मृति द्वारा अभिव्यक्त विचारों को मान्यता प्रदान की कि जिस घर में औरतों की पूजा होती है वह घर देवों के स्थान के समान पवित्र होता है, और उस घर में देवता वास करते हैं।

बाल विवाह का डट कर विरोध किया

स्वामी दयानंद ने हिंदू समाज में उन दिनों अत्यधिक प्रचलित बाल विवाह का डट कर विरोध किया। इसके साथ ही स्वामी जी ने इस बात पर भी जोर दिया कि वर और कन्या को अपना जीवनसाथी चुनने व पसंद करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि माता – पिता विवाह संबंध तय करें तो भी उन्हें वर – कन्या से परामर्श लेना चाहिए। इस प्रकार स्वामी दयानंद ने हिंदू समाज में प्रचलित तमाम बुराइयों का खुलकर विरोध किया। स्वामी जी ने कहा कि विधवा विवाह उचित है, अस्पृश्यता अपराध है और अंतर्जातीय विवाह वर्जित नहीं है।

शिक्षा के संबंध में

स्वामी दयानंद के शिक्षा के संबंध में बहुत महत्वपूर्ण विचार थे। गुरुकुल प्रणाली के आधार पर शिक्षा दिया जाना पसंद थे। जिसके अंतर्गत यह कानून था कि छात्र छात्राओं को अध्ययन काल में नगर या गांव से कम से कम 8 किलोमीटर दूर अावासीय शिक्षा संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए और छात्र व छात्राएं अपनी शिक्षा पूर्ण होने तक वहीं पर रहे। शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के बीच किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाए और सबको पढ़ने लिखने के लिए सम्मान सुविधाएं प्राप्त हो।

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स्वामी दयानंद का यह भी मानना था कि युवक छात्र व युवती छात्राएं संयम में रहें और अपनी शिक्षा के दौरान पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करें। छात्र व छात्राओं को सुयोग्य बनाने और उनमें संस्कार उत्पन्न करने के लिए विद्वान, सच्चरित्र , शिक्षण के प्रति निष्ठावान और संयमी शिक्षकों की विद्यालयों में नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए। स्वामी दयानंद ने शिक्षकों के लिए उच्च मापदंड स्थापित किए।

मानव सहानुभूति का दायरा

स्वामी दयानंद की मानव सहानुभूति का दायरा बड़ा व्यापक था। अक्सर कहा करते थे कि “मैंने आर्यावर्त में जन्म अवश्य लिया है लेकिन मैं उसकी भौगोलिक सीमाओं से बँधा हुआ नहीं हूँ; मेरा उद्देश्य है मानव मात्र की मुक्ति है।” उन्होंने समस्त प्राणियों के कल्याण व लाभ के लिए कामना करते हुए कार्य संपादित किए। उन का धर्म मानवतावादी सार्वभौमवाद था। वह विश्व बंधुत्व के आदर्श के समर्थक थे और उनकी यह हार्दिक आकांक्षा थी कि पूरा संसार शुद्ध वैदिक धर्म का पालन कर उसी के अनुसार आचरण करें।

समाज में व्याप्त बहुत सी कुरीतियों के विरोध

स्वामी दयानंद ने हिंदू समाज में व्याप्त बहुत सी कुरीतियों, बुराइयों तथा सुविचार के प्रचार एवं क्रियान्वयन में अपने जीवन तक की बाजी लगा दी। स्वामी जी ने युगो से सुप्त अवस्था में पड़ी देश की जनता को जगाया और ऐसे एक नए समाज की स्थापना की जो प्राचीन वैदिक सिद्धांत पर आधारित था। इस प्रकार स्वामी दयानंद ने मनुष्य के नैतिक विकास तथा समाज के पुनः निर्माण के कार्य में अत्यधिक जोर दिया। उन्होंने देशवासियों में निर्भीकता और साहस जैसे गुणों के विकास की आवश्यकता को समझा। स्वामी जी का मानना था कि निर्भिकता ही मनुष्य को ऐसी शक्ति प्रदान कर सकती है कि जिसके बल पर है निरंकुशता और उत्पीड़न का सामना कर सकता है। निर्भिकता ही मानव स्वतंत्रता और अधिकारों का आधार है।

स्वामी दयानंद कि मृत्यु

30 अक्टूबर सन् 1883 ई. तो जोधपुर रियासत में स्वामी जी को विरोधियों ने एक षड्यंत्र रच कर के जहर दे दिया जिसके कारण उनका पार्थिव शरीर भारत की माटी में हमेशा हमेशा के लिए विलीन हो गया। देश के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तथा शैक्षिक इतिहास में स्वामी दयानंद का नाम हमेशा अमर रहेगा।


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