Guru Gobind Singh Biography in Hindi | गुरु गोबिन्द सिंह की जीवनी

By | April 9, 2018

Guru Gobind Singh in hindi

Guru Gobind Singh Biography in Hindi | गुरु गोबिन्द सिंह की जीवनी

गुरु गोबिन्द सिंह सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु थे। उनके बचपन का नाम गोबिन्द राय था। वह एक आध्यात्मिक गुरु, योद्धा, कवि और दार्शनिक थे। मुगल बादशाह औरंगजेब ने सारे भारत में अपना आतंक मचा रखा था। वह मंदिरों को तुड़वा रहा था और अपनी मुस्लिम परस्त मजहबी नीति के तहत लोगों को जोर – जबरदस्ती मुसलमान बनाने पर तुला हुआ था। उसकी कारगुजारियों से जनता भयभीत थी। इसी काल में सिखों के 10 वें गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का अवतरण हुआ जिनके साथ मुगलों की कई बार लड़ाइयां हुईं परंतु वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) जीवनपर्यंत धर्म कि रक्षा करने के लिए संघर्षरत रहे।

1. Name:- गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) | बचपन का नाम:- गोबिन्द राय (Gobind Rai)

2. Birth:- 22 December 1666, पटना (Patna)

3. Died:- 7 October 1708, हजूर साहिब नांदेड़, नांदेड़ (Hazur Sahib Nanded, Nanded)

4. Parents – माता-पिता:- गुरु तेग बहादुर, माता गुजरी

5. Religion – धर्म:- सिख धर्म


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Guru Gobind Singh Biography in Hindi | गुरु गोबिन्द सिंह की जीवनी

Family and early life – परिवार और शुरुआती जीवन

गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का जन्म 22 दिसंबर सन् 1666 ई. को पटना में हुआ था। उनके पिता का नाम तेगबहादुर और माता का नाम गूजरी था। गुरु गोबिन्द सिंह के पिता सिखों के नौवें धर्म गुरु थे। जिस वक्त गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का जन्म हुआ था उस समय गुरु गोबिन्द सिंह के पिता गुरु तेगबहादुर पूर्वी भारत की यात्रा पर गया हुआ था। गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) उस समय सिर्फ नौ वर्ष के थे जब उसके पिता गुरु तेगबहादुर का निधन हुआ था, तो इसी कारण से बाल्यावस्था में ही गोविंदराय को सिख धर्म के 10 वें गुरु के रूप में नामित कर दिया गया था (जिसको आज सिख धर्म का अतिंम और दशवाँ गुरू माना जाता है)। इसके बाद करीब आठ वर्ष तक गोविंदराय आनंदपुर में रहे और वही पर उन्होंने फारसी, संस्कृत, बृजभाषा तथा पंजाबी भाषाएँ सीखीं और इनके साथ – साथ हथियार और शस्त्र चलानें कि शिक्षा ली और अभ्यास किया।

Marriage of Guru Gobind Singh – गुरु गोबिन्द सिंह के विवाह

1. गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का पहला विवाह 21 जून 1677 को आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर उत्तर में बसंतगढ़ में माता जितो के साथ हुआ, उस समय गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) कि आयु दस से ग्यारह वर्ष थी। इन दोनों के तीन पुत्र हुए जिनका नाम जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह था।

2. गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का दूसरा विवाह 17 वर्ष की आयु में 4 अप्रैल, 1684 को माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ था। इन दोनों का एक पुत्र था जिसका नाम अजित सिंह था।

3. गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) का तीलरा विवाह 33 वर्ष की आयु में 15 अप्रैल, 1700 को माता साहिब देवन के साथ हुआ था। इन दोनों कि कोई संतान नहीं थी।

Founding the Khalsa – खालसा की स्थापना

सन् 1699 ई. में गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) ने बैसाखी के त्योहार पर आनंदपुर में सिखों की एक सभा बुलाई। हजारों कि संख्या में सिख एकत्रित हुए। उस सभा में भाषण देते हुए अचानक गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) ने नंगी तलवार हाथ में लेकर के सवाल किया कि “कोई धर्म के लिए अपने सिर का त्याग करने के लिए तैयार है” अचानक सभा में सन्नाटा छा गया, फिर एक नौजवान आगे आया और बोला, “मेरा शीश हाजिर है, गुरूदेव!” गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) उसे अंदर तंबू में लेकर गया। जब गुरु गोबिन्द सिंह तंबू से बाहर आए तो उसकी तलवार रक्त से सनी हुई थी। सभा में गुरु गोबिन्द सिंह ने फिर से कहा कि मुझे एक शीश और चाहिए। फिर एक नौजवान आगे आया और गुरु गोबिन्द सिंह के सामने अपना शीश हाजिर कर दिया। इस प्रकार वह एक के बाद एक पाँच नौजवानों को तंबू के अंदर लेकर गया और थोड़ी देर बाद बाहर आए। सभा में यह नज़ारा देख कर के सन्नाटा छा गया, सब एक दूसरे की ओर देखने लगें। अंत में गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) अकेले तंबू के अंदर गया और उन सभी नौजवानों को वापस बाहर लेकर आया। सभा में सभी खुश होकर के कहनें लगें कि ये सब नौजवान तो जीवित हैं, तो फिर तलवार पर रक्त किनका लगा था? वास्तव में गुरु गोबिन्द सिंह ने तंबू के अंदर पाँच बकरें बाँध रखें थें। वह एक नौजवान को अंदर ले जाते और एक बकरे का सिर काट देतें थे। इस प्रकार गुरु गोबिन्द सिंह ने पांचों बकरों का सिर काट दिया था।

गुरु गोबिन्द सिंह ने कहा “ये मेरे पंच प्यारे हैं” इनके अदम्य साहस की भावना के कारण आज नए सिख समुदाय का जन्म हुआ है जिसका नाम होगा “खालसा” । उन पाँचों शिष्यों को गुरु गोबिन्द सिंह ने शिक्षा दी और कहा कि आज के बाद सभी सिख अपने नाम के साथ सिहँ शब्द का प्रयोग करेंगे और इसके साथ ही अपनी दाढी और बाल भी बढ़ाएँगें। कंघा, कच्छा और कृपाण का उपयोग करेंगे।

गुरु गोबिन्द सिंह ने सिखों को पाँच चिन्ह दिए और इन पाँचों चिन्हों का नाम “क” अक्षर से शुरू होता है – केश, कंघा, कच्छा, कड़ा और कृपाण। गुरु गोबिन्द सिंह ने कहाँ “केश भारतीय संत का चिन्ह हैं। तुम संत सैनिक हो। केशों को सँवारने के लिए तुम्हें कंघा रखना होगा। तुम सैनिक हो और सैनिकों की भाँति तुम्हें कच्छा पहनना होगा और साथ ही अपने हाथ में कड़ा भी पहनना होगा। कृपाण केवल अपनी आत्मरक्षा के इस्तेमाल के लिए होगी ।”

उसी दिन से गुरु गोबिन्द राय से उनका नाम गुरु गोबिन्द सिंह हो गया और इसी के साथ एक नया नारा प्रारम्भ किया गया:-

वाहि गुरुजी का खालसा,
वाहि गुरुजी की फतेह।

First War – प्रथम युद्ध

अप्रैल सन् 1689 को गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) ने अपने जीवन की पहली लड़ाई लड़नी पड़ी। उनकी बढ़ती अपार शक्ति और संगठन को देखकर पहाड़ी राजा असंतुष्ट हो गए और ईर्ष्या मानने लगें, फिर कुछ दिनों बाद उन्होंने गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) पर हमला कर दिया। लेकिन उस युद्ध में गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) स्वयं ने भाग लिया। पंजाब के सिहौरा स्थान के फकीर सैयद बुद्धशाह ने अपने सात सौ सैनिकों के साथ गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) कि मदद की। पहाड़ी राजाओं की फौज भाग गई और गुरु गोबिन्द सिंह युद्ध में जीत कर वापस लौट आए। उसके बाद से उन्होंने लोहगढ़, आनंदगढ़, केशगढ़, और फतेहगढ़ में दुर्ग बनवाए।

Death of family members – परिवार के सदस्यों की मौत

गुरु गोबिन्द सिंह की मां माता गूजरी और उनके दो छोटे पुत्रों को सरहिन्द के मुस्लिम सूबेदार वजीर खान ने पकड़ लिया था जिनकी उम्र 5 और 8 वर्ष थी । सूबेदार वजीर खान ने उन दोनों बच्चों को मुस्लिम धर्म कबूल करने के लिए कहा लेकिन उन दोनों ने गर्व व स्वाभिमान से अपना सिर ऊंचा करके कहा “मियां जी! हम कभी भी मुसलमान नहीं बनेंगे हम सिख हैं और सिख ही रहेंगे।” और अंत में उन दोनों लड़कों को दीवार में जिंदा चिनवा दिया गया। मुगल सेना के खिलाफ दिसम्बर 1704 की लड़ाई में गुरु गोबिन्द सिंह के सबसे बड़े बेटों, 13 व 17 वर्ष की उम्र में ही मारे गए । माता गूजरी यह पीड़ा सहन न कर पाई और बच्चों के गम में उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए।

Death of Guru Gobind Singh – गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु

गुरु गोबिन्द सिंह (Guru Gobind Singh) को 20 फरवरी सन् 1707 को औरंगजेब की मृत्यु का समाचार मिला गुरु गोबिन्द सिंह दिल्ली की ओर चल दिए। औरंगजेब की मौत के पश्चात होगा उसका उत्तराधिकारी बहादुर शाह ( मुअज्जम) बना और वह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। कुछ दिनों बाद बहादुर शाह ने गुरु गोबिन्द सिंह को मिलने के लिए बुलवाया। जब गुरु गोबिन्द सिंह दिल्ली पहुंचे तो वहां उस ने उनका जोरदार स्वागत सत्कार किया और उसने गुरु गोबिन्द सिंह की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया। बहादुर शाह असल में गुरु गोबिन्द को संत के रूप में देखता था। दिन शांति और सुकून के साथ गुजरने लगे। गुरु गोबिन्द सिंह और बादशाह बहादुर शाह दोनों स्थान स्थान की यात्रा करने के लिए साथ साथ जाते थे। वह एक मित्र के रुप में उसकी सेना के साथ दक्षिण गए। गुरु गोबिन्द सिंह गोदावरी नदी के किनारे नांदेड़ में रुक गए। नादेड में पहुंचने के कुछ समय बाद एक दिन गुरु गोबिन्द सिंह शाम के समय तंबू में अकेले लेटे हुए थे। उसी समय दो पठान हाथ में छुरी लेकर उनकी तंबू में घुस आए और उन्होंने गुरु गोबिन्द सिंह पर हमला कर दिया। गुरु ने भी अपनी तलवार से एक पठान हत्यारे को मारकर दिया, और दूसरे हत्यारे को गुरु के शिष्य ने पकड़ कर मौत के घाट उतार दिया। गुरु गोबिन्द सिंह के घाव को सील दिया गया, लेकिन 1 दिन तीर चलाने का अभ्यास करते समय उसके टांके खुल गए। गुरु गोबिन्द सिंह समझ गए कि अब मेरा अंतिम समय आ गया है। गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, “ मैं सिखों का अंतिम गुरु हूँ। अब भविष्य में ग्रंथ तुम्हारा रास्ता बताएंगे।” आखरी संदेश देते हुए गुरु गोबिन्द सिंह ने कहां, “ मेरी मृत्यु पर दुखी मत होओ। वर्षा जिस प्रकार बीज को सींचती है, वैसे ही मेरे शब्द हमेशा खालसा के साथ हैं और खालसा को बल देते रहेंगे।” और अंत में 7 अक्टूबर सन् 1708 ईं को ‘वाहि गुरुजी की फतेह’ कहकर गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने प्राण त्याग दिए।


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