Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग

By | April 17, 2018

Ashtang marg in Hindi

Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग

भगवान बुद्ध ने अष्‍टांगिक मार्ग का उपदेश दिया था। जो की महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है जो दुखों से मुक्ति पाने और आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में बताया गया है। अष्टांग मार्ग के सभी ‘मार्ग’, ‘सम्यक’ (सम्यक = अच्छी या सही) शब्द से शुरु होते हैं । “Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग”

बौद्ध प्रतीकों में अक्सर अष्टांग मार्गों को धर्मचक्र का आठ ताड़ियों (प्रवक्ता) द्वारा निरूपित किया जाता है। बौद्ध धर्म अनुयायी इन्‍हीं 8 मार्गों पर चलकर मोक्ष प्राप्‍त करते हैं। बुद्ध द्वारा बताए गए इन 8 मार्गों का अपना अलग मतलब है। कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है।

और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है। मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प को ‘प्रज्ञा’ कहा गया है, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम को ‘शील’ कहा गया है, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि को ‘समाधि’ कहा गया है। इस प्रकार प्रज्ञा, शील समाधि मे आष्टांगिक मार्ग शामिल हो जाता है। आइए जानते हैं।

Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग

1. सम्यक (सम्यक = अच्छी या सही) दृष्टि :

चार आर्य सत्य में विश्वास करना, चोरी नहीं करना, व्यभिचार( पर-स्त्रीगमन) नहीं करना, जीव हिंसा नहीं करना(हिंसा और मांसाहार मे अंतर है),ये शारीरिक सदाचरण हैं। इसके अलावा बुद्ध ने वाणी के सदाचरण का पाठ भी पढ़ाया। जिसमें मनुष्‍यों को झूठ न बोलना, चुगली नहीं करना, कठोर वचन नहीं बोलने की शिक्षा दी गई। लालच नहीं करना, द्वेष नहीं करना, सम्यक दृष्टि रखना ये मन के सदाचरण है।

2. सम्यक (सही) संकल्प:

चित्त से राग-द्वेष नहीं करना, ये जानना की राग-द्वेष रहित मन ही एकाग्र हो सकता है, करुणा, मैत्री, मुदिता, समता रखना, दुराचरण(सदाचरण के विपरीत कार्य) ना करने का संकल्प लेना, सदाचरण करने का संकल्प लेना, धम्म पर चलने का संकल्प लेना।

3. सम्यक (सही) वाक (वाणी ):

मधुर बोलने का अभ्यास करना, टूटे हुओ को मिलने का अभ्यास करना, सत्य बोलने का अभ्यास करना, धम्म चर्चा करने का अभ्यास करना।

4. सम्यक (सही) कर्मांत (कर्म):

सम्यक कर्मांत में आता है, हानिकारक कर्म न करना, प्राणियों के जीवन की रक्षा का अभ्यास करना, चोरी ना करना, पर-स्त्रीगमन नहीं करना। बुद्ध ने सत्य और न्याय के लिए हिंसा को यदि आवश्यक हो तो जायज ठहराया।

5. सम्यक (सही) आजीविका या जीविका:

कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना, मेहनत से आजीविका अर्जन करना, पाँच प्रकार के व्यापार नहीं करना, जिनमे आते हैं, शस्त्रों का व्यापार, जानवरों का व्यापार, मांस का व्यापार, मद्य का व्यापार, विष का व्यापार, इनके व्यापार से आप दूसरों की हानि का कारण बनते हो।

6. सम्यक (सही) प्रयास या व्यायाम:

अपने आप सुधरने की कोशिश करना, आष्टांगिक मार्ग का पालन करने का अभ्यास करना, शुभ विचार पैदा करने वाली चीजों/बातों को मन मे रखना, पापमय विचारो के दुष्परिणाम को सोचना, उन वितर्कों को मन मे जगह ना देना, उन वितर्कों को संस्कार स्वरूप मानना, गलत वितर्क मन मे आए तो निग्रह करना, दबाना, संताप करना।

7. सम्यक (सही) स्मृति (Memory):

स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना, कायानुपस्सना, वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना, धम्मानुपस्सना, ये सब मिलकर विपस्सना साधना कहलाता है, जिसका अर्थ है, स्वयं को ठीक प्रकार से देखना। ये जानना की राग-द्वेष रहित मन ही एकाग्र हो सकता है। किसी भी मनुष्य को, जिसे स्वयं को जानने की इच्छा हो, को विपस्सना जरूर करनी चाहिए, इसी से दुख-निवारण के पथ की शुरुआत होगी।

8. सम्यक (सही) समाधि:

निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना, अनुत्पन्न पाप धर्मो को ना उत्पन्न होने देना, उत्पन्न पाप धर्मो के विनाश मे रुचि लेना, अनुत्पन्न कुशल धर्मो के उत्पत्ति मे रुचि, उत्पन्न कुशल धर्मो के वृद्धि मे रुचि। इन सबको शब्दशः पालन करने से जीवन सुखमय होगा, निर्वाण (सास्वत खुशी, परमानंद एवं विश्राम की स्थिति) की प्राप्ति होगी।

निर्वाण का सुख बड़ा है और ये सबको प्राप्त हो सकता है, इसके लिए गृह-त्याग की आवश्यकता नहीं है।बस माध्यम मार्ग के पालन की आवश्यकता है। बहुत लोगों को गलतफहमी है की बुद्ध का धम्म भिक्षुओं का धम्म है। पर ऐसा नहीं है, बुद्ध का धम्म भिक्षुओं, भिक्षुणियों, उपासक और उपासिकाओ से पूर्ण होता है।

Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग

परिचय:

भगवान्‌ बुद्ध ने बताया कि तृष्णा ही सभी दु:खों का मूल कारण है। तृष्णा के कारण संसार की विभिन्न वस्तुओं की ओर मनुष्य प्रवृत्त होता है; और जब वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता अथवा जब वे प्राप्त होकर भी नष्ट हो जाती हैं तब उसे दु:ख होता है। तृष्णा के साथ मृत्यु प्राप्त करनेवाला प्राणी उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है और संसार के दु:खचक्र में पिसता रहता है। अत: तृष्णा का सर्वथा प्रहाण करने का जो मार्ग है वही मुक्ति का मार्ग है। इसे दु:ख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा कहते हैं। भगवान्‌ बुद्ध ने इस मार्ग के आठ अंग बताए हैं :

Ashtang marg in Hindi | जीवन को दिशा दिखाने वाला भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग

सम्यक्‌ दृष्टि, सम्यक्‌ संकल्प, सम्यक्‌ वचन, सम्यक्‌ कर्म, सम्यक्‌ आजीविका, सम्यक्‌ व्यायाम, सम्यक्‌ स्मृति और सम्यक्‌ समाधि।

इस मार्ग के प्रथम दो अंग प्रज्ञा के और अंतिम दो समाधि के हैं। बीच के चार शील के हैं। इस तरह शील, समाधि और प्रज्ञा इन्हीं तीन में आठों अंगों का सन्निवेश हो जाता है। शील शुद्ध होने पर ही आध्यात्मिक जीवन में कोई प्रवेश पा सकता है। शुद्ध शील के आधार पर मुमुक्षु ध्यानाभ्यास कर समाधि का लाभ करता है और समाधिस्थ अवस्था में ही उसे सत्य का साक्षात्कार होता है।

इसे प्रज्ञा कहते हैं, जिसके उद्बुद्ध होते ही साधक को सत्ता मात्र के अनित्य, अनाम और दु:खस्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है। प्रज्ञा के आलोक में इसका अज्ञानांधकार नष्ट हो जाता है। इससे संसार की सारी तृष्णाएं चली जाती हैं। वीततृष्ण हो वह कहीं भी अहंकार ममकार नहीं करता और सुख दु:ख के बंधन से ऊपर उठ जाता है। इस जीवन के अनंतर, तृष्णा के न होने के कारण, उसके फिर जन्म ग्रहण करने का कोई हेतु नहीं रहता। इस प्रकार, शील-समाधि-प्रज्ञावाला मार्ग आठ अंगों में विभक्त हो आर्य आष्टांगिक मार्ग कहा जाता है।

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